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जिसकी जैसी भावना,वैसा ही मन होय-कन्हैया लाल श्रीवास

भावना

*********************************** जिसकी जैसी भावना,वैसा ही मन होय। एक कलुषित काज करें,दूजा निर्मल बोय।                  ★★★★★ सदा रहे सदभावना,बँधे प्रेम की डोर। रिश्तें सींचे स्नेह से,मिलता भाव विभोर।                  ★★★★★ प्रेम भाव की भावना, होता नेक विचार। मान रखें सद भाव की,मिलती खुशी अपार।                  ★★★★★ कलुष भावना के तले,होता अनुचित  काज। दुषित  मन  दुष्टता  करें , सज्जन नेक समाज।                  ★★★★★ कलुष भावना त्याग कर,करें जगत उपकार। नित नूतन सद काज हो,मिलें सकल उपहार।                  ★★★★★
कन्हैया लाल श्रीवास भाटापारा छ.ग. बलौदाबाजार भाटापारा
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शब्द संपदा के धनी बाबूलाल शर्मा जी के "डोंगा, चोंगा और पोंगा" पर अभूतपूर्व दोहे का आनंद लीजिये ( Babulal sharma's dohe)

*डोंगा* डोंगा कह माँझी सुनो, करलें धारा पार! अहम् छोड़ साझे चलें , गहरा पारावार!!
वर्षा जल में खेलते, बालक बिन पतवार! कागज, डोंगा की बना, नाव बहाए धार!! *चोंगा* धातु बाँस से बन सके, चोंगा कागज काठ! अधिवक्ता पहने करे, दूरभाष पर ठाठ!! *पोंगा* पनपे पोंगा पंथ बहु, दे लबार उपदेश! धर्म सनातन को भुला, ढोंगी धारे वेश!!
पोंगा पंथ पड़ौस का, पतित पाक़ पथभ्रष्ट! आज आड़ आतंक के, करता करम निकृष्ट!! . ••••••••••• ✍© बाबू लाल शर्मा,बौहरा सिकंदरा,दौसा, राजस्थान 👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀

प्रेम के प्यासे जगत् में हैं वही इंसान होते-आर आर साहू की कविता(bhukh-pyaas)

---------------भूख-प्यास-----------

भाव के भूखे,सुने हमने हैं कि भगवान होते। प्रेम के प्यासे जगत् में हैं वही इंसान होते।।
भूख लगती सत्य की तो आदमी हैं संत बनते, और सत्ता-भूख से है आदमी हैवान बनते।
शास्त्र तो साधन,निरा संकेत है सच जानने का, जी रहे सद्भाव में वो सत्य की पहचान बनते।
धारणाओं में घिरी,जो चेतना वो बंदिनी है,  मुक्त-मानस ही मनुजता का महा आह्वान बनते।
छल-कपट से प्राप्त सत्ता,सत्य से है मुँह चुराती, और प्रेमी त्याग सत्ता,विश्व की हैं शान बनते।
राग दरबारी जहाँ,वहाँ बस द्वेष की ही भैरवी है, किन्तु प्रज्ञावान निर्भय,नवल-युग-नव-तान बनते।
------  R.R.Sahu

शब्द संपदा के धनी बाबूलाल शर्मा जी के "कोकिला, काकली और कंकाली" पर अभूतपूर्व दोहे का आनंद लीजिये ( Babulal sharma's dohe)

*कोकिला*
मधुर बोल रस छल करे, गुण कटु काग कुनैन! अण्डे पाले, ज्वर हरे, जबकि कोकिला चैन!!
कोयल काली कुहुक कर, करती भोर विभोर! विरहन प्रियतम याद में, भीगे काजल कोर!!
*काकली*
मैना, सारन पिक वचन, मृदु रव साठी धान! कैंची घुँघची,भोर ध्वनि, कहें काकली मान!!
*कंकाली*
आदि शक्ति आराधना, महिमा मात अनूप! दुष्ट दलन दुर्गा करे, धर कंकाली रूप!!

करे कोकिला काकली, कवि कविताई कर्म! कंकाली के कोप से, बचे धरा मनु धर्म!!

✍© बाबू लाल शर्मा,बौहरा सिकंदरा,दौसा, राजस्थान

फाँसी वाली रस्सी-राजकिशोर धिरही

फाँसी वाली रस्सी
फाँसी वाली रस्सी से कुछ नहीं होने वाला है मूरख अंधविस्वास को अक्सर बोने वाला है
अर्जनदा थाना के सलोनी की घटना सुन लो पूजापाठ में अंधविस्वास या विज्ञान को चुन लो
एक बैगा के कहने पर कमाई का जरिया बनाया जी पंचुराम दूर के साले को फाँसी पर लटकाया जी
बालक की हत्या कर रस्सी पूजा करता  जान लेकर हत्यारा कैसे झोली भरता
भिलाई आलबरस का अपराधी रहने वाला अंधविस्वास में आकर लालची क्या कर डाला
फाँसी वाली रस्सी के चक्कर में मत आना झूठ विद्या तंत्र मंत्र से जान किसी की मत गंवाना
बलि प्रथा,जीभ चढ़ाना बकरे काटना ये सब छोड़ो सत्य अहिंसा में रहकर अपना नाता जोड़ो
राजकिशोर धिरही
तिलई,जांजगीर छत्तीसगढ़

विशिष्ट- कुण्डलिया छंद~बाबूलालशर्मा

*विशिष्ट- कुण्डलिया छंद*
.                  १. *वेणी*
मिलती  संगम में  सरित, कहें  त्रिवेणी धाम! तीन  भाग  कर  गूँथ लें, कुंतल  वेणी  बाम! कुंतल   वेणी   बाम, सजाए   नारि  सयानी! नागिन  सी  लहराय, देख  मन चले जवानी! कहे लाल  कविराय, नारि  इठलाती  चलती! कटि पर वेणी साज, धरा पर सरिता मिलती! .                      .               २.  *कुमकुम*
माता   पूजित  भारती , अपना  हिन्दुस्तान! समर क्षेत्र पूजित सभी, उनको तीरथ मान! उनको तीरथ  मान, देश हित शीश चढ़ाया! धरा रंग  कर लाल, मात  का  मान बढ़ाया! शर्मा  बाबू लाल , भाल पर तिलक लगाता! रजकण कुमकुम मान, पूजता भारत माता! .                   .                 ३ *पायल*
बजती पायल  स्वप्न में, प्रेमी  होय विभोर। कायर  समझे  भूतनी, डर  से  काँपे  चोर। डर से  काँपे  चोर, पिया  भी करवट  लेते। जगे  वियोगी सोच , मनो  मन  गाली  देते। शर्मा बाबू लाल, यशोदा  हरि हरि भजती। हँसे  नन्द  गोपाल, ठुमकते पायल बजती।  .                 🤷🏻‍♀🦚🤷🏻‍♀ .               ४- *कंगन*
पहने   चूड़ी   पाटले , कंगन   मुँदरी  हार। हिना  हथेली  में  रचा, तके  पंथ   भरतार। तके …

दो हजार उन्नीस तुम जाओ बीस को आना है- मधु गुप्ता "महक"

दो हजार उन्नीस तुम जाओ  बीस को आना है, पर तुमने हमें क्या दिया,ये भी तुम्हें बताना है। दो हजार उन्नीस तुम्हें जाना है..... 
कहीं भुकम्प से क्षति, तो कहीं तूफानी आघात, कहीं बम ब्लास्ट,तो कहीं खुशियों की सौगात। कोशिश भ्रष्टाचार रोकने की,पर रोक न सके रेप। कहीं बाढ़ से बहता गाँव तो कहीं सूखी रेत। आओ तुम्हें इस धरा को सजाना है। दो हजार बीस ............
कहीं रौशनी,नई दिशा तो कहीं सुनहरी रात, इस तरह बीत गया ये वर्ष वक्त के साथ। नयी उम्मीदों के साथ बीस तुम्हे सलाम, हो देश की उन्नति, खुशहाल रहे हर ग्राम। आने वाले को जाना होगा, ये रीत  निभाना है दो हजार बीस तुम्हें आना है।
*मधु गुप्ता "महक"*

नये सपने नये अवसर, नया ये वर्ष लाएगा- बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

मौक्तिका (नव वर्ष स्वागत) 1222*4 (विधाता छंद पर आधारित) (पदांत का लोप, समांत 'आएगा')
नया जो वर्ष आएगा, करें मिल उसका हम स्वागत; नये सपने नये अवसर, नया ये वर्ष लाएगा। करें सम्मान इसका हम, नई आशा बसा मन में; नई उम्मीद ले कर के, नया ये साल आएगा।
मिला के हाथ सब से ही, सभी को दें बधाई हम; जहाँ हम बाँटते खुशियाँ, वहीं बाँटें सभी के ग़म। करें संकल्प सब मिल के, उठाएँगे गिरें हैं जो; तभी कुछ कर गुजरने का, नया इक जोश छाएगा।
दिलों में मैल है बाकी, पुराने साल का कुछ गर; मिटाएँ उसको पहले हम, नये रिश्तों से सब जुड़ कर। कसक मन की मिटा करके, दिखावे को परे रख के; दिलों की गाँठ को खोलें, तभी नव वर्ष भाएगा।
गरीबी ओ अमीरी के, मिटाएँ भेद भावों को; अशिक्षित ना रहे कोई, करें खुशहाल गाँवों को। 'नमन' नव वर्ष में जागें, ये' सपने सब सजा दिल में; तभी ये देश खुशियों के, सुहाने गीत गाएगा।
बासुदेव अग्रवाल 'नमन' तिनसुकिया

माह की लोकप्रिय कविता