टूटते सपनों की कसक( Vijiya Gupta samidha)

अब तक कुल देखे गये :


हर किसी की जिंदगी में होती है,
कुछ टूटते सपनों की कसक।
सब अरमान सभी के,
कभी पूरे नहीं होते।
नन्ही किलकारी की आवाज से पहले,
माँ बुनने लगती है,रंग बिरंगे धागों से,
अरमान भरे मोजे।
लेकिन कभी-कभी,
अधूरे रह जाते हैं,
उन रंगों में बसे सपने।
बची रह जाती है एक कसक 
भीगी पलकों के साथ

एक नववधू सजाती है सपने,
सदासुहागन,
मृत्युशैया तक जाने के।
किन्तु कभी कभी,
काल की क्रूर दृष्टि के आगे।
टूट कर बिखर जाते हैं उसके सपने,
और वह खुद भी।

एक नन्ही परी,
उड़ना चाहती है,खुले आसमान में
उन्मुक्त,स्वतन्त्र।
पूरे करना चाहती है अपने सपने।
किन्तु कभी कभी,
कुछ पशुतुल्य मनुष्यों के द्वारा,
नोंच लिए जाते है उसके पँख।
टूटकर बिखर जाते है,
उसके सारे सपने
जीना ही भूल जाती है वो,
जिंदा लाश की तरह।

बड़े अरमान से पालते हैं,
माँ-बाप अपने बच्चों को।
एक-एक कदम चलना सिखाते हैं,
उँगली पकड़कर।
वही बच्चे छोड़कर चले जाते हैं,
अपने मां - बाप को वृद्धाआश्रम में
उनके टूटे,बिखरे सपनों के साथ।

बड़े अरमान से किसान,
बोता है अपने खेत में फसल।
चलाता है हल,
सींचता है अपने पसीने से।
एक एक पौधे की देखभाल,
करता है अपने बच्चे की तरह।
लेकिन अक्सर धरे रह जाते हैं,
उसके सारे अरमान।
टूट जाते हैं उसके सपने
जो उसने एक एक पौधे पर
सँजोये थे,
और मजबूर हो जाता है,
वह किसान खुदकुशी के लिए।

हर किसी की जिंदगी में होती है,
कुछ टूटते सपनों की कसक.....

-------------
विजिया गुप्ता "समिधा"
दुर्ग-छत्तीसगढ़

Post a Comment

0 Comments