जब भी सुनता हूँ नाम तेरा- निमाई प्रधान'क्षितिज' का एक ऐसी कविता जो आपका भी मन मोह लेगी(Jab bhi sunta hun naam tera)

अब तक कुल देखे गये :
कविता/निमाई प्रधान'क्षितिज'
*"जब भी सुनता हूँ नाम तेरा!"*
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तेरे आने की आहटें... 
बढ़ा देती हैं धड़कनें मेरी !
मैं ठिठक-सा जाता हूँ-
जब भी सुनता हूँ नाम तेरा!!

तेरे इश्क़ के जादूओं का असर..यूँ रहा
मेरी रूह बाहर रही,मैं ही तो अंदर रहा 
ख़ुद से मिलने को अक्सर...
मैं बहक-सा जाता हूँ-
जब भी सुनता हूँ नाम तेरा!!

मरु-थल में भी गुलों की बारिश 
तेरे संग होने की रही है ख़्वाहिश
पलाश में गुलाबों का इत्र पाकर
मैं महक-सा जाता हूँ-
जब भी सुनता हूँ नाम तेरा!!

ख़यालों की दुनिया से ज्यों चौंककर भागा
तेरी पायलों की धुन में बेसुध-मन ; नाचा
ख़ुद में, बेख़ुदी में..
मैं यूँ ही गुनगुनाता हूँ-
जब भी सुनता हूँ नाम तेरा!!

इक भीनी-सी ख़ुशबू...दूर तलक से
ज़मीं से नहीं; है जब आती फ़लक से 
अंतर्मन के उच्छवासों में फिर 
मैं तुमको पा जाता हूँ-
जब भी सुनता हूँ नाम तेरा!!
© *निमाई प्रधान'क्षितिज'*

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